बुधवार, 20 जुलाई 2016

बढ़ता बचपन

 
 
हम सबके अंदर होता है एक बच्चा प्यारा सा
मासूम और बेवकूफ सा, ऑंखें जिसकी बोलें ज्यादा
जुबां से हो तोतला...
हम सब होते हैं बच्चे से, खुद और खुदा के सामने..
माँगते, जिद करते, रूठते भी 
रोते भी जो फूट-फूट कर कभी...
पर छुपा लेते बड़ी चालाकी से,
अपने बचपने को अपने बड़प्पन से..
क्योंकि दुनिया उसे ठगती है, 
मासूमियत को नोचती है,
बेवकूफ़ी पर हँसती है, 
गिरने पर उठाती नहीं,
चलना फिर से सिखाती नहीं,
दुलारती नहीं ज़िद करने पर,
रूठने पर फ़िक्र भी नही करती ये,
गलती की गुंजाइश न छोड़ती!
सिर्फ चाबुक चलाती है समझदारी का
आँसुओं को झूठा है जब से कहती 
तबसे वो बच्चा बड़ा होने पर
मजबूर सा होने लगता है।
दिल से भले वो कोमल  है
बाहर से वो पत्थर दिखने लगता है
निर्मल, कोमल और पावन दिल पर
वह दुनियावी कालिख़ मलने लगता है।
     

                      -सव्यसांची (अदिति)

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